Environmental Studies Class 4 NCERT

Environmental Studies Class 4 NCERT ctet paper 1

हमारा देश भारत बहुत ही विशाल है और यहां हर राज्य भौगोलिक तथा सांस्कृतिक आधार पर बहुत ही भिन्न है
विभिन्न राज्यों में बालकों द्वारा स्कूल जाने के लिए प्रयोग किए गए साधन व मार्ग :-

लद्दाख में स्कूल जाने के लिए बच्चों को नदी पार करना पड़ता है वह इसे ट्राली की सहायता से पार करते हैं।

केरल में कुछ इलाकों में बच्चे स्कूल तक पहुंचने के लिए वल्लम का प्रयोग करते हैं वल्लम ।
लकड़ी की छोटी नाव को वल्लम कहा जाता है।

राजस्थान में बालक स्कूल पहुंचने के लिए ऊंट गाड़ी का प्रयोग करते हैं।

मैदानी इलाकों में बच्चे स्कूल जाने हेतु बैलगाड़ी का प्रयोग करते हैं।(Environmental Studies Class 4 NCERT)

जुगाड़ गाड़ी यह मोटर बाइक की तरह दिखती है परंतु पीछे से लकड़ी के पत्तों से बनी होती है।

पहाड़ी इलाकों में बच्चे को स्कूल पहुंचने के लिए बर्फ पर पैर जमा कर चलना होता है।

पक्षियों के कान बाहर नहीं दिखते लेकिन सिर के दोनों तरफ छोटे-छोटे छेद होते हैं । यह छेद पंखों द्वारा ढके रहते हैं इन्हीं की मदद से पक्षी सुनते हैं। (Environmental Studies Class 4 NCERT)

जानवरों के शरीर पर डिजाइन उनके शरीर पर बाल के कारण होते हैं।

जिन जानवरों के शरीर पर बाल होते हैं , तथा इनके कान बाहर दिखाई देते हैं । यह जानवर बच्चों को जन्म देते हैं। (Environmental Studies Class 4 NCERT)

जिन जानवर के कान बाहर दिखाई नहीं देते और इनके शरीर पर बाल भी नहीं होते यह अंडे देते हैं।

एक वयस्क हाथी दिन में 100 किलोग्राम से ज्यादा पत्ते व झाड़ियां खा लेता है । एक दिन में केवल 2 से 4 घंटे ही हाथी सोता है। हाथी को पानी तथा कीचड़ में खेलना बहुत पसंद होता है । इससे उसकी शरीर को ठंडक मिलती है । हाथी के कान पंख की तरह होते हैं वह इसे हिलाकर हवा उत्पन्न करता है।

तीन महीने का हाथी के बच्चे का वजन 300 किलोग्राम तक होता है । हाथी झुंड में रहना पसंद करते हैं । हाथियों के झुंड में केवल हथिनीया और उनके छोटे बच्चे ही होते हैं । झुंड की मुखिया बुजुर्ग हथिनी होती है । एक झुंड में 10 से 12 हानियां तथा उनके बच्चे होते हैं । हाथी 10 से 15 वर्ष तक ही झुण्ड में रहता है फिर वह झुण्ड छोड़ देता है तथा अकेला रहने लगता है ।

हाथी परेशानी में एक दूसरे की मदद करते हैं तथा अपने बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के लिए एक दूसरे का साथ देते हैं।

बगुला भैंस की पीठ पर बैठकर सूक्ष्म जीवों को खाता है इससे भैंस को भी फायदा होता है,इसे सहजीवी कहते हैं।

खेजड़ली नामक गांव राजस्थान के जोधपुर में है । इस गांव का नाम खेजड़ली यहां पर पाए जाने वाले वृक्षों जिसे खेजड़ी कहते हैं।

इस गांव के लोग बिश्नोई कहलाते हैं । यंहा के लोग वृक्षों तथा जानवरों की रक्षा करते हैं। खेजड़ी वृक्ष रेगिस्तानी इलाकों में बहुतायत में पाए जाते हैं। इसे ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती। इस पेड़ की छाल दवा के काम आती है । इस वृक्ष की लकड़ी में कीड़े नहीं लगते इस वृक्ष से फलिया प्राप्त होती है। जिसे सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है इसकी पत्तियां जानवर खाते हैं । तथा वृक्ष की छांव में बच्चे खेलना पसंद करते हैं।

अनिता कुशवाहा बिहार में मुजफ्फरपुर जिले के रहने वाली है ।अनीता एक चमकता सितारा यानी स्टार गर्ल है ।
स्टार गर्ल वह लड़की होती है जो स्कूल पहुंच कर अपनी लाइफ बदल देती है।

आरटीई एक्ट 2009 यह 6 से 14 साल के सभी बच्चों को मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है।

मुजफ्फरपुर में बहुत लीची के पेड़ है लीची के पेड़ मधुमक्खियों को आकर्षित करते हैं। यहां के लोग मधुमक्खियों को पालकर शहद बनाते हैं जिससे उन्हें आमदनी प्राप्त होती है।

अक्टूबर से दिसंबर तक का समय मधुमक्खियों के अंडे देने का होता है । यही समय मधुमक्खियों के पालन का भी उचित होता है।

लीची के फूल फरवरी में खेलते हैं ।
एक बक्से में 12 किलोग्राम तक सहद आ सकता है।

हर छत्ते में एक रानी मक्खी होती है ,जो अंडे देती है। छत्ते में नर मक्खी भी होते हैं ।और बहुत सी मजदूर मक्खियां भी होती है । मजदूर मधुमक्खियां दिन भर काम करती हैं । शहद के लिए फूलों का रस चूसती है , जब किसी मधुमक्खी को रस मिल जाता है तो वह विशेष प्रकार का नाच करती है । जिससे दूसरी मधुमक्खियों भी वहां आकर्षित हो जाए और रस का पता लग जाए।

छत्ता बनाने का काम तथा बच्चों को पालने का काम मजदूर मक्खियां ही करती हैं । नर मक्खी छत्ते के लिए कुछ खास काम नहीं करते।

चीटियां भी मृदुल का रहती है । सभी चिड़िया का काम बटा होता है। रानी चिड़िया अंडे देती है । सिपाही चीटियां बिल का ध्यान रखती है। काम करने वाले चीटियां भोजन एकत्रित करती है । दीमक तथा ततैया भी इसी तरह समूह में रहती है।

वलसाड,गांधीधाम,अहमदाबाद, कच्छ गुजरात में तथा कोझिकोड केरल में स्थित है तथा मडगांव गोवा में स्थित है।

गोवा से केरल के बीच रेल द्वारा 92 सुरंग और 2000 पुल पढ़ते हैं।

वलीयम्मा मलयालम में मां की बड़ी बहन को वाली अम्मा कहते हैं।

अम्मूमा मां की मां को यानी नानी को अम्मूमा कहते हैं।

फेरी पानी में आने जाने का साधन होती है ।फेरी एक तरह की नाव होती है । केरल के कई भागों में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए फेरी का इस्तेमाल किया जाता है।

रेलवे टाइम टेबल से हम कई जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं। जैसे ट्रेन कब आएगी ट्रेन कब पहुंचेगी ट्रेन किस प्लेटफार्म में आएगी दोनों स्थानों के बीच दूरी कितनी है तथा किराया कितना लगेगा।

गांधीधाम (गुजरात) से नगरकोइल (केरल) के बीच ट्रेन द्वारा तय की गई दूरी 2649 किलोमीटर है ,जो कि इन दोनों शहरों के बीच में 14 स्टेशन पड़ते हैं।

आंध्र प्रदेश में लोगों द्वारा एक विशेष कैंप लगता है । इस कैंप में शादीशुदा लड़कियों को पुनः स्कूल बेचा जाता है , ताकि वे अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी कर सके।

लड़की की उम्र 18 वर्ष तथा लड़के की उम्र 21 वर्ष शादी हेतु उपयुक्त मानी जाती है।

कर्णम मल्लेश्वरी एक वेटलिफ्टर है । यह आंध्र प्रदेश के रहने वाली है। इनके द्वारा 130 किलोग्राम तक वजन उठाया गया है । इन्होंने भारत के बाहर 29 मेडल जीते हैं।

फूलों की घाटी उत्तराखंड में स्थित जबकि शांत घाटी केरला में स्थित है।

मधुबनी चित्रकारी की बहुत प्राचीन प्रथा है । मधुबनी यह बिहार में मधुबनी नाम का एक जिला है । यहां त्योहारों पर घर की दीवारें आंगन में विशेष चित्र बनाए जाते हैं । इसलिए इसका नाम मधुबनी पड़ा है । चित्र पिसे हुए चावल के घोल में रंग मिलाकर बनाए जाते हैं। रंग बनाने के लिए हल्दी नील फूल पेड़ों का रंग का इस्तेमाल किया जाता है । चित्र में इंसान जानवर पेड़ फूल पंछी मछलियों और अन्य कई जीव जंतु साथ में बनाए जाते हैं।

उत्तर प्रदेश में कचनार के फूलों को सब्जी बनाई जाती है , जबकि केरल में खेलों की फूलों की सब्जी बनाई जाती है । और महाराष्ट्र में सहजन के फूलों के पकोड़े बनाए जाते हैं।

उत्तर प्रदेश का कन्नौज जिला इत्र के लिए मशहूर है । यहां गुलाब की पंखुड़ियों से गुलाब जल तथा इत्र बनाए जाते हैं । कन्नौज के इत्र नगरी के नाम से भी जाना जाता है।

डेरा गाजी खान नामक जगह पाकिस्तान में स्थित है।

मिट्टी में गोबर मिलाकर लिखने से मिट्टी में कीड़े नहीं लगते हैं।

नींद आता कीकर की लकड़ियों में दीमक नहीं लगते इनका प्रयोग फर्नीचर दरवाजे बनाने में किया जाता है।

सोहना गांव हरियाणा में स्थित है यहां घर बनाने के लिए आसपास में उपलब्ध चीजों का प्रयोग किया जाता है।

प्याज के बीज बोने की 20 दिनों के बाद छोटे-छोटे पौधे निकल आते हैं।

गिजुभाई बधेका गुजरात में रहते थे हुए बच्चों के लिए मजेदार किस्से कहानियां और पत्र लिखते थे । उनके लिखे पत्रों में पर्यावरण तथा पक्षियों के बारे में बताया गया है।

कल चिड़ी (Indian Robbin) यह अपना घोंसला पत्थरों के बीच खाली स्थान में बनाते हैं तथा इसका घोसला घास से बना होता है। इसके ऊपर पौधों की नाजुक टहनी,जड़े,टहनी, जड़े तथा ऊन आदि बिछाया जाता है ।

कौवा का घोंसला लोहे की तार तथा लकड़ी की शाखा जैसी चीजों से बना होता है ।

कोयल अपना घोंसला नहीं बनाती तथा अपना अंडा कौवे के घोंसले में देती है । कौवा अपने अंडों के साथ कोयल के अंडे को भी सैता है।

कौवा पेड़ की ऊंची डाल पर घोंसला बनाता है।

फाख्ता पक्षी का घोंसला कैक्टस के कांटो के बीच या मेहंदी की मैडम में बनाया जाता है।

गुरैया आमतौर पर घर में या आसपास कहीं भी घोंसला बना लेती ,अलमारी के पीछे, घर की दीवारों के आले में इत्यादि ।

कबूतर भी ऐसे ही अपना घोंसला बनाता है पुराने मकानों में या खंडहरों में अक्सर कबूतर शहरी इलाकों में रहना पसंद करते हैं।

बसंत गोरी पेड़ के तने में गहरा छेद बनाकर उसमें अंडा देती है।

दर्जन चिड़िया अपनी चोंच से पत्तों को सी लेती है उसके बीच में अंडा देती है यह इसका घोंसला होता।

शक्कर खोरा चिड़िया यह चिड़िया पेड़ या झाड़ी की डाली पर अपना लटकता घोंसला बनाती है । इसका घोंसला बाल,पतली टहनियां,
सूखे, पत्ते,रुई,पेड़ की छाल के टुकड़े और कपड़ों के चित्रों का बना होता है।

नर वीवर पक्षी घोंसला बनाता है माता वीवर इन सभी घोसले को देखती है । उनमें से जो सबसे अच्छा लगता है उसमें वह अंडा देती है।

बिल्ली के दांत नुकीले होते हैं जो मांस वाढणे और काटने के काम आता है।

गाय के आगे के दांत छोटे होते हैं पत्तों को काटने के लिए घास जलाने के लिए पीछे के दांत चपटे और बड़े होते हैं।

सांप के दांत नुकीले होते हैं पर यह अपने शिकार को को चबाता नहीं बल्कि निगल जाता है।

गिलहरी के दांत हमेशा बढ़ते रहते हैं दांतों से काटने और कुतरने के कारण जिसके दांत घिसते रहते हैं।

भीमा संघ यह बच्चों की पंचायत थी कर्नाटक की होलगुंडी गांव में इस पंचायत ने पानी की समस्या का समाधान किया था ।

पौधों जड़ों द्वारा पानी कैसे लेते हैं इस उम्र में बालक नहीं समझ पाते।

रेगिस्तानी ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाला पेड़ होता है । यह अपनी ऊंचाई का 30 गुना जमीन के नीचे फैला होता है । इसकी जड़ें जमीन में गहरी जाती है। जब तक कि इसे पानी ना मिल जाए पानी इसके तने में जमा होता रहता है । लोग इसकी इसमें पतला पाइप डालकर पानी निकाल लेते हैं। (Environmental Studies Class 4 NCERT)

बिहू का त्योहार चावल की नई फसल कटने पर मनाया जाता है । बिहू त्यौहार 14 व 15 जनवरी को मनाया जाता है । पहले दिन को उरूका कहते हैं इस दिन स्थाई छप्पर बनाते हैं। इसे भोला घर कहा जाता है । और ओस, अमन तथा बोरा चावल की तीन किस्में है जो कि पश्चिम बंगाल में बनाई जाती है।

मलयालम में चिटटप्पन को छोटा भाई तथा कुंजम्मा पिता के छोटे भाई की पत्नी को कहते हैं।

अबू धाबी संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी है यहां सिर्फ खजूर के पेड़ दिखाई देते हैं यहां की मुद्रा दिरहम है।
यंहा गर्मी ज्यादा होने के कारण लोग सूती वस्त्र पहनते हैं । शरीर तथा सिर को ढक कर रखते हैं तेज धूप से बचने के लिए।

केरल में घर के आंगन में मसालों का बगीचा होता है वहां तेजपत्ता,छोटी इलायची,बड़ी इलायची, काली मिर्ची बोई जाती है।

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